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शब्द-शब्द अनमोल पर आपका स्वागत है !

संवाद सम्मान-2009

आपका स्वागत है शब्द-शब्द अनमोल पर... हम लेकर आयें हैं आपके लिए अनमोल शब्दों की प्रासंगिकता सहित प्रस्तुति.....भारतीय सनातन संस्कृति से जुड़े हिंदी के दुर्लभ-विस्मयकारी और महत्वपूर्ण शब्दों की व्याख्या, शब्दों की उत्पति तथा उन शब्दों से जुडी अन्य महत्वपूर्ण जानकारियाँ....

Monday, September 6, 2010

गुरु का अभिप्राय


गुरु (संस्कृत शब्द, अर्थात भारी या महत्वपूर्ण, इसलिए आदरणीय या श्रद्धेय ), हिन्दू धर्म में एक व्यक्तिगत अध्यात्मिक शिक्षक या निर्देशक, जिसने अध्यात्मिक अंतर्दृष्टि प्राप्त कर ली हो । कम से कम उपनिषदों के समय से भारत में धार्मिक शिक्षा में गुरुकुल पद्धति के महत्व पर जोर दिया जाता रहा है । प्राचीन भारत की शैक्षिक प्रणाली में वेदों का ज्ञान व्यक्तिगत रूप से गुरुओं द्वारा मौखिक शिक्षा के माध्यम से शिष्यों को दिया जाता था । पारंपरिक रूप से पुरुष शिष्य गुरुओं के आश्रम में रहते थे और भक्ति तथा आज्ञाकारिता से उनकी सेवा करते थे ।
बाद में भक्ति आन्दोलन के उत्थान के साथ , जो ईष्ट देवता के प्रति भक्ति पर जोर देता है , गुरु और भी महत्वपूर्ण चरित्र बन गए, किसी संप्रदाय के प्रमुख या संस्थापक के रूप में वह श्रद्धा के पात्र थे और उन्हें अध्यात्मिक सत्य का जीवित मूर्तिमान रूप माना जाता था । इसप्रकार उन्हें देवता के जैसा सम्मान प्राप्त था । गुरु के प्रति सेवा भाव और आज्ञाकारिता की परंपरा अब भी विद्यमान है ।
मूलतः गुरु वह है जो ज्ञान दे । संस्कृत भाषा के इस शब्द का अर्थ शिक्षक और उस्ताद से लगाया जाता है । हिन्दू तथा सिक्ख धर्म में गुरु का अर्थ धार्मिक नेताओं से भी लगाया जाता है ।
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15 Comments:

mala said...

बहुत सटीक और सार्थक कहा ........
धन्यवाद !

गीतेश said...

बेहतरीन और समसामयिक आलेख के लिए ढेरो बधाईयाँ !

पूर्णिमा said...

सार्थक प्रस्‍तुति, बधाईयाँ !

ZEAL said...

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बहुत सही बात लिखी आपने। मुझे तो हर कहीं जहाँ सीखने को मिलता है, अपना गुरु ही लगता है। जीवन का वृहत सत्य तो छोटे-छोटे बच्चों से सीखने को मिलता है।

सुन्दर लेख,

आभार।
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निर्मला कपिला said...

बहुत सार्थक सन्देश है इस रचना मे। बहुत दिन बाद यहाँ आने के लिये क्षमा चाहती हूँ
ब्लागवाणी के जाने से मुझे तो बहुत क्षति हुया है। कई बार इतने अच्छे ब्लाग भी छूट जाते हैं। शुभकामनायें

डॉ० डंडा लखनवी said...

अच्छी जान अनकारी मिली। साधुवाद!
सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

muskan said...

Bahut Khubsurat Abhivyakti.

कुमार राधारमण said...

शब्द स्वयं में खूंटे से बंधी नाव जैसे हैं। उनका अर्थ समझाने के लिए गुरू की ज़रूरत होती है। इसी अर्थ में,मीरा ने भी कहा,'सत की नाव खेवटिया सतगुरू'। अर्थात्,सत्य पर अडिग रहना मात्र काफी नहीं है,सद्गुरू भी चाहिए जो उस नाव को इस भवसागर से खेकर उसपार ले जाए। यह यों ही नहीं है कि गुरू को ही ब्रह्मा,विष्णु,महेश-सब माना गया।

रजनी मल्होत्रा नैय्यर said...

बेहतरीन आलेख के लिए ढेरो बधाईयाँ !

Kunwar Kusumesh said...

हफ़्तों तक खाते रहो, गुझिया ले ले स्वाद.
मगर कभी मत भूलना,नाम भक्त प्रहलाद.

होली की हार्दिक शुभकामनायें.

DR. ANWER JAMAL said...

आपको होली की शुभकामनाएँ
प्रहलाद की भावना अपनाएँ
एक मालिक के गुण गाएँ
उसी को अपना शीश नवाएँ

मौसम बदलने पर होली की ख़शियों की मुबारकबाद
सभी को .

कविता रावत said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति
आपको सपरिवार होली की हार्दिक शुभकामनाएं

Patali-The-Village said...

बहुत सटीक और सार्थक रचना|धन्यवाद|

निर्मला कपिला said...

ग्यानवर्द्धक आलेख। शुभकामनायें।

हल्ला बोल said...

ब्लॉग जगत में पहली बार एक ऐसा सामुदायिक ब्लॉग जो भारत के स्वाभिमान और हिन्दू स्वाभिमान को संकल्पित है, जो देशभक्त मुसलमानों का सम्मान करता है, पर बाबर और लादेन द्वारा रचित इस्लाम की हिंसा का खुलकर विरोध करता है. जो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कायरता दिखाने वाले हिन्दुओ का भी विरोध करता है.
इस ब्लॉग पर आने से हिंदुत्व का विरोध करने वाले कट्टर मुसलमान और धर्मनिरपेक्ष { कायर} हिन्दू भी परहेज करे.
समय मिले तो इस ब्लॉग को देखकर अपने विचार अवश्य दे
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