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संवाद सम्मान-2009

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Wednesday, June 8, 2011

सुबह-ए-बनारस

एक कविता


करतालों की जगह

बजने लगा है पाखण्ड

अन्धविश्वास

रुढियों को कंधे पे लटकाए

सीढियां चढ़ रहा है

चट्ट चट्ट

लज्जित है सुबह की

सूर्य की किरणें

खंड-खंड तोता रटंत

यजमान लुभाते आख्यान

एक अखंड मुजरा

एक तेलौस मेज पर

टेल हुए नाश्ते के सामान

फैला पाश्चात्य

सुबह-ए- बनारस !

  • रवीन्द्र प्रभात
(दैनिक जन्संदेश टाइम्स/ ०७ जून २०११ )

9 Comments:

Ruchika Sharma said...

बड़ी खूबसूरत है जी...सुबह-ए-बनारस

हंसी के फव्‍वारे

Dr (Miss) Sharad Singh said...

भावपूर्ण सुन्दर कविता....

निर्मला कपिला said...

करतालों की जगह

बजने लगा है पाखण्ड

अन्धविश्वास

रुढियों को कंधे पे लटकाए
बिलकुल सही कहा आपने। अच्छी लगी रचना। शुभ. का.

देवेन्द्र पाण्डेय said...

सुबह-ए-बनारस देख कर ऐसे भाव भी आ सकते हैं!

आदरणीय श्री केदार नाथ सिंह की प्रसिद्ध कविता बनारस के कुछ अंश देखिए...

कभी सई-साँझ
बिना किसी सूचना के
घुस जाओ इस शहर में
कभी आरती के आलोक में
इसे अचानक देखो
अद्भूत है इसकी बनावट
यह आधा जल में है
आधा मंत्र में
आधा फूल में है
आधा शव में
आधा नींद में है
आधा शंख में
अगर ध्यान से देखो
तो यह आधा है
और आधा नहीं है
.......

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ (Zakir Ali 'Rajnish') said...

सुबह-ए-बनारस क्‍या कहने।

---------
बाबूजी, न लो इतने मज़े...
चलते-चलते बात कहे वह खरी-खरी।

वन्दना said...

बहुत सुन्दर भावाव्यक्ति।

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

बिक्लुल सही बात कही है सर!

सादर

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) said...

आपका स्वागत है "नयी पुरानी हलचल" पर...यहाँ आपके ब्लॉग की किसी पोस्ट की कल होगी हलचल...
नयी-पुरानी हलचल

धन्यवाद!

shikha varshney said...

नई पुरानी हलचल ने परिचय कराया इस सुन्दर रचना का..